Saturday, October 1, 2016

निकला हुवा था बरसात मैं घर अपने...

फॉर अंकिता,

निकला हुवा था बरसात मैं घर अपने,
ये सोच कर के इंतजार मैं मेरे वो बेठी होगी,
सपने सजाये बरसात कि बुंद को
उंगलियोंसे लपेट बैठी होगी,

मैं दिख जाऊ कही दूर से हि उसे,
मैं दिख जाऊ कही दूर से हि उसे,
वो नाजरोको मेरी नजरोसे
मिलानेकी कोशिश मैं लगी होगी।

💓सचिन💓

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